उपजीव्य काव्य: By- Dr. Dipti Kumari

            उपजीव्य काव्य

    B.A. PART 1, SANSKRIT

    03.07.2007

DR. DIPTI KUMARI ,ASSISTANT PROFESSOR, DEPARTMENT OF SANSKRIT, MLTC SAHARSA

     प्रत्येक साहित्य में प्रतिभाशाली कवियों की लेखनी से प्रसूत कतिपय ऐसे मर्मस्पर्शी काव्य हुआ करते हैं जिनसे स्फूर्ति और प्रेरणा लेकर अवांतर- कालीन कविगण  अपने काव्यों  को सजाया करते हैं। ऐसे काव्य को हम व्यापक प्रभाव- संपन्न होने के कारण ‘उपजीव्य काव्य’ के नाम से पुकार सकते हैं। संस्कृत- साहित्य में भी ऐसे उपजीव्य-काव्य विद्यमान हैं जिनसे संस्कृत भाषा और अर्वाचीन प्रांतीय भाषाओं के कवियों ने अपने विषय के निर्देश के लिए और काव्य शैली के विमल विधान के निमित्त सतत उत्साह और अश्रान्त स्फूर्ति ग्रहण की और आज भी वे कर रहे हैं। ऐसे उपजीव्य-काव्य की संख्या 3 है-  रामायण, महाभारत और श्रीमद् भागवत। इन तीनों का अवांतर काव्य – साहित्य के ऊपर बड़ा ही विशाल मार्मिक और आभ्यंतर प्रभाव पड़ा है।

     आदिकवि की वाणी पुण्य सलिला भागीरथी है , जिसमें अवगाहन कर पाठक और कवि अपने आप को पवित्र ही नहीं जानते, बल्कि रसमयी काव्य- शैली के हृदयावर्जक स्वरूप को समझने में भी कृतकार्य होते हैं। महाभारत तो वस्तुतः व्यासवाणी का विमल प्रसाद है। इसके विषय में कहा गया है-

           “यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्र क्वचित्।”

     तीसरा उपजीव्य ग्रंथ‘ श्रीमद्भागवत ‘विस्तृत और प्रभावशाली ग्रंथ है। भारतीय धर्म के विकास में भागवत् का व्यापक प्रभाव किसी भी विज्ञ आलोचक से छिपा नहीं है। परंतु भारतीय काव्य के कोमल विलास और प्रचार प्रसार में भी भागवत का नितांत महनीय प्रभाव आलोचकों की दृष्टि से ओझल नहीं हो सकता।

             “रसो वै स:” के प्रत्यक्ष निदर्शन में रसिक शिरोमणि श्याम सुंदर की ललित लीला और लावण्यमय विग्रह की भव्य झांकी प्रस्तुत करने वाला वह भागवत पुराण भारतीय साहित्य के गीति-काव्यों का अक्षय स्रोत है।  कृष्ण – भक्त कवियों ने अपने काव्यों में लालित्य, सरसता और हृदयनुरंजकता का पुट देकर  उन्हें शोभन बनाया है।

           इन ग्रंथों में उपजीव्यता और काव्य की दृष्टि से समानता होने पर भी स्वरूपगत और कालगत विषमता स्पष्ट है। रामायण महाकाव्य है, महाभारत इतिहास और श्रीमद्भागवत पुराण है।

  बाल्मीकि ने भगवान रामचंद्र  के आदर्श चरित्र का अंकन रसात्मिका शैली के द्वारा किया है, जिसमें केवल श्रोत्र सुख देने वाले वर्णों का विन्यास नहीं होकर सह्रदयों  के हृदय को मुग्ध करने वाले वाक् विलास  ही अधिक हैं। महाभारत शांत- रस प्रधान सूह्रतसम्मित  काव्य है जिसमें वेदव्यास ने भारतीय संस्कृति के ग्राह्य, आध्यात्मिक और व्यवहारिक रूप का अंकन पांडव- कौरव के संघर्ष के व्याज से किया है। श्रीमद् भागवत चरित्र प्रधान होने से पुराण है, जिसमें मानव के कल्याण के निमित्त धरा धाम पर अवतीर्ण  होने वाले भगवान के नाना चरितों, अवतारों एवं संबंधित कथाओं का मुख्यतः विवरण विन्यस्त  है।         Thank you