कवि कोकिल विद्यापति

मैथिल कोकिल विद्यापतिक जन्म 1350 ई०क लगभग मधुबनी जिलाक विसफी ग्राम मे भेल छलैन्हि। हिनक पिताक नाम गणपति ठाकुर छलैन्हि। हिनक पूर्व लोकनिक अनेक पीढ़ी सँ मिथिलाक राज दरबार सँ सम्बन्ध छल। हिनक वंश पण्डितक वंश छल। स्वयं विद्यापति स्मृति, इतिहास, पुराण, साहित्य आदि अनेक विषय पर अधिकार रखैत छलाह। जे हुनक अनेक रचना सँ सिद्ध होइछ। विद्यापतिक लिखल संस्कृत, अपभ्रंश तथा मिथिला भाषा मे अनेक रचना उपलब्ध अछि। संस्कृत मे हिनक रचना – पुरूष परीक्षा, विभागसार, भूपरिक्रमा, शैवसर्वश्वसार, दुर्गाभक्ति तरंगिणी, गयापत्तलक आदि प्रसिद्ध अछि। अपभ्रंश मे हिनक दू गोट रचना – कीर्तिलता एवं कीर्तिपताका अछि। मैथिली मे हिनक सहस्त्रावधि गीत उपलब्ध अछि। हिनक संस्कृत मे ‘मणिमंजरी’ तथा संस्कृत मैथिली मे ‘गोरक्षविजय’ नाटक प्रकाशित अछि। विद्यापतिक सभ सँ बेशी चर्चित अछि मिथिला भाषा मे रचित गीत सभ। एहि गीत सभ सँ ओ साहित्य संसार मे अमर छथि तथा हुनका ‘अभिनव जयदेव’, ‘मैथिल कोकिल’, ‘कवि कंठहार’ आदि उपाधि सँ विभूषित कएल जाइत अछि।                           

हिनक गीतक विषय मुख्यतः श्रृंगार एवं भक्ति अछि। श्रृंंगारिक रचनाक आधार राधा कृष्णक प्रेम अछि। भक्तिक क्षेत्र मे विद्यापति विशेषतः शिव संबंधी गीतक रचना कएने छथि। ओना देवताक संबंध मे हिनक रचना उपलब्ध होइत अछि। एहि कारणे विद्यापति केँ केओ वैष्णव मानैत छथि तँ केओ शैव आ केओ शाक्त। मैथिल परंपरा मे ई स्मार्त पञ्च देवोपासक मानल जाइत छथि। विद्यापति प्रेम एवं सौन्दर्यक कवि छथि। ओ प्रेम चाहे साधारण व्यक्ति परक हो अथवा देव परक।.सौन्दर्योपासना तँ हिनक रचना मे सर्वत्र उपलब्ध होइछ। जीवन एवं जगत मे विद्यापति कें जतहि सौंदर्य भेटलन्हि ताहि पर मुग्ध भए ओ ओकरा अपन रचना मे आबद्ध कएल। हिनक ई सौन्दर्य बोध श्रृंगारे धरि सीमित नहि रहल प्रत्युत भक्तिओक मूल श्रोत ओएह बनल।

विद्यापतिक ओइनवार वंशक अनेक राजा लोकनिक दरबार सँ संबंध रहलाह। हिनक रचना मे शिव सिंह, लखिमा आदिक नामोल्लेख एहि धारणा केँ पुष्ट करैत अछि।                               

विद्यापति दीर्घजीवी भेलाह। अठासी वर्षक आयु मे 1438 ई० मे गंगा तट पर ई अपन शरीर त्याग कएल। हिनका विषय मे अनेक किंवदंती समाज मे प्रचलित अछि। जनश्रुति अछि जे स्वयं शिव हिनक चाकरी उगनाक नामे कएने छलाह।            

हिनक रचनाक प्रचार प्रसार मिथिला मे सर्वाधिक भेल तथा एखनहु हुनक गीतक गायन सभ अवसर पर होइत अछि। हिनक गीत सभ  संगीत शास्त्रानुसार रागताल मे बान्हल अछि। अपन भाषा एवं भाव सौंदर्यक कारणे मिथिलाक जनमानस केँ विद्यापतिक गीत रचना आह्लादित कए रहल अछि। हिनक गीतक अनेकों संकलन आएल अछि तथा ओकर सभक अध्ययन मनन एखनहु भए रहल अछि।

प्रशान्त कुमार मनोज, अतिथि शिक्षक, मैथिली विभाग