विद्यापतिक भक्ति भावनाक परिचय: By- Prashant Kumar Manoj

विद्यापतिक भक्ति भावनाक परिचय –  ‘भक्ति’ शब्द ‘भज’ धातु मे भावार्थक ‘क्तिन्’ प्रत्यय जोड़ला सँ बनैछ। ई धातु सेवा व्यापार बोधक थिक। नारद भक्ति सूत्र मे भक्तिक परिभाषा देल गेल अछि – “सा भक्तिः त्वस्मिन् परम प्रेम रूपा” अर्थात् परमात्माक प्रति परम प्रेम भक्ति थिक।शाण्डिल्य सूत्र मे कहल गेल अछि – “भक्तिः परानुरक्तिरीश्वरे” अर्थात् ईश्वरक प्रति परम अनुरक्ति भक्ति थिक।             गीतगोविन्दकार जयदेव श्रृंगार आओर भक्तिक परस्पर समन्वित भाव धाराक रूप मे ग्रहण कएलनि। ओ स्पष्ट रूपेँ कहलैन्हि यदि हरि स्मरण मे मोन सरस होए, यदि विलास कला मे कुतूहलता होए तँ जयदेवक मधुर कोमल कान्त पदावली केँ देखल जाउ -“यदि हरिस्मरणे सरसंभनो यदि विलास कलासु कुतूहलम्।मधुर कोमलकान्त पदावलीं श्रृणु तदा जयदेव सरस्वतीम्।।”श्रृंगार आओर भक्तिक एहि समन्वय धर्मिताक संबंध मे विशद् रुपें विचार कएल गेल अछि। भक्तिक परमोपलब्धिक लेल साधन केँ कतेको सोपान पार करए पड़ैत छैक। भागवतक एक श्लोक मे श्रद्धा तथा रति केँ भक्तिक सोपान कहल गेल अछि। महाकवि प्रारंभ मे अभिनव जयदेवक अन्यतम श्रंगारिक पदक सेहो रचना कएलन्हि। ओ अपना केँ श्रंगारिक कविक रुप मे उद्घोषित कएलनि।                          संसारक अनेकों भक्त कवि सांसारिक भोगक पश्चातहि योग मे प्रविष्ट भेलाह। भर्तृहरि, तुलसीदास एकर ज्वलंत उदाहरण छथि। विद्यापतिक पदावली आ अंग्रेजीक परम्पराक कविताक सादृश्य दिसि कतेक विद्वानक ध्यान गेलनि अछि। परञ्च प्रायः ओ लोकनि भावक अपेक्षा काव्य कौशलक प्रति विशेष दत्तचित्त रहल होएताह। विद्यापति अपन पूर्व क्रिया चर्याक उल्लेख करैत परिणामक लेल चिन्हित होइत छथि –               “माधव हम परिणाम निराशा,              आद जनम हम निन्दे गमाओल,               जरा शिशुकत दिन गेला,               निधुवन रमणी रस रंगे मातल               तोहे भजब कोन बेला।” विद्यापतिक पदक अनुशीलन एवं चिन्तन सँ ई बुझना जाइछ जे जीवनक अपराह्न मे महाकवि केँ सेहो भोगक प्रति वितृष्णा एवं भक्तिक लिप्सा बढ़ैत गेलनि।                       संप्रदाय कोनो व्यक्तिक ओ निधि थिक जे नाना प्रकारक तर्क वितर्कक उपरांत स्थापित भेल रहैत अछि। तापस कवि विद्यापति कोनो देवता विशेषक कट्टर उपासक नहि छलाह। हिनक भक्ति भावना सभ देवताक प्रति समाने भाषित होइत अछि। हिनक भक्ति भावना कखनहुँ जँ शिवक प्रति उमड़ल अछि तँ कखनहुँ माता दुर्गाक प्रति उमड़ल अछि। गंगाक प्रति अपन श्रद्धा देखबैत काल जगज्जननी जानकी सीता केँ विस्मृत नहि कए सकलाह। जँ सोलह कला युक्त योगेश्वर कृष्णक अराधना कएलनि तँ आदर्श पुरूष मर्यादा पुरुषोत्तम रामक बन्दना सँ नहि चुकला। हिनक व्यापक एवं सार्थक दृष्टिकोण तँ तखन दृष्टिगोचर होइछ जखन सभ देवी देवताक विभिन्न रुप हिनका एके बुझना जाइत छैन्हि। इएह देखैत समीक्षक लोकनि हिनका शैव, शाक्त, वैश्णव, पंचदेवोपासक स्मार्त आ एकेश्वरवादी स्वीकार करैत छथि।        हिनक भक्ति भावनाक व्यापकताक पर्यवेक्षण करबाक हेतु हिनक पदावलीक पदक अतिरिक्त संस्कृत मे रचित ग्रंथक अवलोकन आवश्यक अछि। संगहि अध्ययन, मनन – चिन्तन ओ विचारक लेल पृथक – पृथक रुपेँ विभिन्न संप्रदायक विचार सेहो विचारणीय अछि।                     विद्यापति समग्र रुप सँ कोनो ‘वाद’क समर्थक नहि भए विशुद्ध भक्त छलाह। हुनका जखन जे स्फुरित भेलन्हि तकरे वर्णन कएलन्हि। कोनो गीतक पांति वा श्लोकक आधार पर हिनक विचारधारा केँ संप्रदाय विशेषक संज्ञा सँ विभूषित नहि कएल जा सकैछ। विद्यापतिक व्यक्तित्व अत्यंत गुम्फित आओर ओझरायल अछि। ई नाना प्रकारक पुष्पक वनस्थली छलाह कोनो एक फूलक गमला नहि।