विषेशोक्ति अलंकार

विभावना अलंकारकविपरीत एहि अलंकार मे कारण रहलो पर कार्य नहि होइत छैक। तेँ कविवर सीताराम झा लिखने छथि –  “कारण हो परिपूर्ण, जों उत्पन्न नहि काज।   विषेशोक्ति भूषण ततए, वर नहि सुकवि समाज।।”उदाहरणार्थ –  “अम्ब चरण भज जनिक मन, अपराधहुँ नहि रोष।  खरचहुँ कएनए नहि घटए, जनिक दयामय कोष।।”                             

एतय रहलो पर कार्य नहि भए रहल अछि। खर्च भेलाक बादो खजाना मे, कोष मे कमी नहि होएत एवं अपराध भेलो पर क्रोध नहि होएत। प्रमाणित करैत अछि जे कारण रहलो पर कार्य नहि भेल। आओर तेँ एहि मे विशेषोक्ति अलंकार भेल।                         

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                  ब्याज स्तुति अलंकारजतए स्तुति द्वारा निंदा भए जाए अथवा निंदाक कथन सँ स्तुति आभास भए जाए तँ ओतए ब्याज स्तुति अलंकार होइत अछि। सीताराम झाक शब्द मे – “स्तुति सँ निंदा होएब निंदा सँ स्तुति ज्ञान। स्तुति सँ स्तुति होएब तँ कवि ब्याज स्तुति भान।।”उदाहरणार्थ -“निश्चय शंभु बताह छथि, सबटा अटपट काज।अपने मांगथि भीख ओ, अनका दै छथि राज।।”                           एतए यद्यपि वर्णन मे निंदा रहितहुँ स्तुति भए जाइत अछि। महादेव केँ यद्यपि बताह कहि देल गेल अछि। हुनकर प्रत्येक क्रिया कलाप केँ अटपट मानि लेल गेल अछि। मुदा एहि मे हुनक एहन चारित्रिक गुणक उत्कर्ष देखाओल गेल अछि। जाहि सँ हुनक अपूर्व दानशीलता स्तुति भए गेल अछि। एहि प्रकारें एहि मे निंदा द्वारा स्तुति भेल अछि। तहिना निम्नलिखित पांति मे स्तुति द्वारा निंदा भए गेल अछि –  “दूति अहाँ सन हमर के, हित साधक अछि आन।  हमरा बदला मे अहीं, कएल हुनक सम्मान।।”                          

माननी नयिका यद्यपि एतय अपन अन्तरंगिणी दूति केर उपर सँ तँ प्रशंसा करैत छथि मुदा ओहि मे सन्निहित अछि हुनक मर्म वेधी व्यंग्य द्वारा क्रिया कलापक भर्त्सना आओर तेँ एतय स्तुतिक माध्यम सँ निन्दा भए गेल अछि। तेँ एहि मे ब्याज स्तुति अलंकार भेल।