शिक्षा शीर्षक निबंधक समीक्षा- By:Dr. Prashant Kr. Manoj

भाषा साहित्य मे सर्वप्रथम मिथिला भाषामय इतिहास लिखि कए महामहोपाध्याय मुकुन्द झा बक्शी अमर भए गेलाह। कोनहुँ भाषा साहित्यक लेल इतिहास अनिवार्य मानल गेल अछि। कारण बिनु इतिहासक कोनहुँ भाषा साहित्यक रुप रेखा केँ विकास मे साहित्यक गतिविधि केँ निरुपित करब संभवे नहि अछि। ई मिथिलाक बहुविधि उल्लेख करैत मैथिली साहित्य केँ प्रांजल, संस्कृतनिष्ठ एवं विद्वतापूर्ण गतिशैलीक रुप मे प्रस्तुत कएलनि। डा.जयकान्त मिश्र हिनका गद्यक दोसर उत्थानक प्रतिनिधि मानलैन्हि।           

प्रस्तुत निबंध मे शिक्षा ओकर व्यवस्था केर प्रसंग शंका एवं ओकर समाधानक उल्लेख अछि।इतिहास साक्षी अछि जे विश्वक मानचित्र पर भारत वर्षक स्थान, महत्व, उत्कृष्टता, एकर सांस्कृतिक आ शैक्षणिक उपलब्धिक कारणेँ स्वीकृत भेल। भारतीय जन जीवन मे शिक्षाक विशेष महत्व रहल अछि। तहू मध्य मिथिला जनपदक महत्व विशेष रुपेँ चर्चित रहल शिक्षाक प्रचार प्रसारक दृष्टि सँ। किन्तु आई शिक्षाक दिश जखन समस्त देश, सभ जातिक व्यक्ति, सभ समाजक चेष्टारत अछि। ओतहि मिथिला मे एखन धरि शिक्षाक दृष्टि सँ तत्परताक पूर्णतः अभाव देखैत छी। आ ओकर परिणाम अछि जे आई हमरा लोकनि दीन – हीन अवस्था मे पड़ल अछि। स्वतः प्रश्न उठैछ जे हमरा लोकनिक उन्नति कोना होएत। उन्नतिक मार्ग तँ अनेक अछि किन्तु हमरा लोकनि अंग्रेजक अनुकरण, ओकर रहन सहन, भेष भूषा मे तँ कएलहुँ। किन्तु ओकर शिक्षा प्रणाली, व्यवहार कुशलता, कार्यक क्षमता केर अनुकरण नहि कए सकलहुँ। संगहि जे क्यो ताहि दिस अग्रसर भेलाह तनिका सामाजिक उपहास सहए पड़लैन्हि आ हतोत्साहित भए उठलाह। एहने स्थिति मे कहल गेल जे- “अपना थिक ने अनकर नीक ने”। यथार्थतः हमरा लोकनिक सामाजिक परिवेश, व्यवस्था, चिन्तन धारा एहि उक्तिकेँ चरितार्थ करैछ।                             

शिक्षाकेँ शरीर, मन धर्म आ नीतिक बलेँ उत्पन्न शक्ति कहल गेल अछि। पुरुषार्थक उपलब्धि एहि शक्तिक बलेँ होइत रहल अछि। शारीरिक आ मानसिक शक्ति परस्पर एक दोसर पर आश्रित रहैछ। स्वस्थ शरीर मे निर्मल मनःस्थिति रहैत अछि तेंँ शारीरिक आ मानसिक स्थिति ताहि प्रकारेँ सम्बद्ध अछि। जे एक दोसराक अभाव मे स्वतः समाप्त भए जाएत। शारीरिक श्रम ओ शिक्षा प्रथमहि अनिवार्य अछि। किएक तँ स्वस्थ शरीरक अभाव मे मानसिक व्यापार, स्मरण शक्ति आदिक रास्ता स्वतः समाप्त भए जाइछ। तेँ मानसिक शिक्षार्थी शारीरिक व्यायाम ओ शक्ति पर मानसिक ह्रास नहि होअए दैत छथि। किन्तु संप्रति मैथिल जातिक बच्चा लोकनि मे मुख्यतः संस्कृतक छात्र लोकनि मे शारीरिक शक्तिक प्रति पूर्णतः उपेक्षा भाव देखैत छी। किएक तँ ओ लोकनि एकरा हास्यास्पद मानैत छथि आ दुर्व्यसन बुझैत छथि।               

महामहोपाध्याय मुकुन्द झा बक्शी धार्मिक आ नैतिक शक्तिक प्रसंग अपन मंतव्य एहि शब्देँ व्यक्त कएलन्हि – “धार्मिक शिक्षा सँ नित्य नैमित्तिक काम्यकर्म्म सँ लय कए समस्त सत् (कर्तव्य) असत् (अकर्तव्य) कर्मक स्वरूप आओर फल समास (संक्षेप) व्यास (विस्तार) रुपेँ देखायब अभिप्रेत अछि।जकरा शरीर आओर मन दुहू सँ घनिष्ठ संबंध छैक। आओर नैतिक शिक्षा अर्थात् व्यावहारिक शिक्षा मे गुरु – शिष्यक परस्पर व्यवहार सँ लय कए समस्त नीति आओर पदार्थ विद्या (साइन्स) पर्यन्तक शिक्षा देल गेल अछि।” एहि उक्ति सँ स्पष्ट होइछ जे शरीर आओर मन मे घनिष्ठ संबंध एवं नैतिक अर्थात् व्यावहारिक शिक्षा मे नीति एवं विज्ञानक शिक्षाकेँ महत्व देल गेल अछि।                                     लेखक महोदय केँ सभ सँ विशेष वेदना भेलैन्हि संस्कृत शिक्षाक दिश विरक्ति भाव आ अंग्रेजी शिक्षाक दिश अनुरक्ति भाव देखि। किएक तँ शिक्षा थिक ‘स्वान्तः सुखाय’। किन्तु आई मिथिला मे ई मूल रूप केर परित्याग कए काल्पनिक  लोक मे विचरण कए रहल अछि। आ तकर परिणाम भेल जे मिथिला, मैथिल आ मैथिली निरंतर ह्रासोन्मुख होईत रहल। लेखकक व्यथा कथा एहि शब्द सँ स्पष्ट होइछ जे – “जाहि शिक्षा चतुष्टयक बलेँ तोहरा ओहिठाम प्रतिपक्षी भ आबि केओ कोनो विषय मध्य प्राप्त विजय भए नहि गेलाह अतएव तोहर नाम ‘मध्यन्ते रिपवोस्यमिति मिथिला’ राखल गेलहु से तँ आई शिक्षा कौशल शिक्षणार्थ परमुखप्रक्षी भए रहल छल।”         

मैथिलीक दिन प्रतिदिन शारीरिक, नैतिक एवं धार्मिक शिक्षा सँ वंचित होएब अवश्य खेदक विषय अछि। स्वभिमान पर आघात अछि। किन्तु एकर इतिहास मात्र शिक्षाक आधार पर स्थापित रहल। किन्तु संप्रति जैँ उत्तरोत्तर एहि मे ह्रासता अबैत चल गेल तैँ मिथिलाक गौरव पर अनेक प्रश्न चिन्ह उपस्थित भए गेल। आई एकर मूल क्षति पर सेहो प्रश्न चिन्ह उपस्थित भए गेल। आब प्रश्न उठैछ जे मूल प्रति केकरा मानल जाए। यदि मानसिक शिक्षा सँ शास्त्रीय शिक्षा अभिप्रेत अछि तँ मिथिला एखनहुँँ अनेक जनपद सँ आगाँ अछि। एखनहुँ अनेकों आचार्य अपन रचना सँ, वैदुष्य सँ, बुद्धि वैभव सँ परंपरा स्थापित कए रहल अछि। तखन मिथिला केँ शिथिला कोना मानल जाए। एकर मूल कारण अछि जे संप्रति हमरा लोकनिक वैदुष्यक प्रति, शिक्षाक दिश ओतेक सचेष्ट नहि छी जतेक हमर परंपरा कहि रहल अछि आ जाहि प्रकारक युग चेतना कहि रहल अछि।                                     आई विद्वताक अभाव अछि, किन्तु एकर परंपरा अत्यंत दृढ़ अछि। तंत्र, मंत्र, शास्त्र, व्याकरण, ज्योतिष छन्द, निरुक्ति आदिक प्रणेता लोकनि कुमारिल भट्ट, मंडन मिश्र, पक्षधर मिश्र, महेश ठाकुर, गोकुल नाथ उपाध्याय सँ लए महाराज मिथिलेश धरि साहित्यिक परंपराक प्रभाव अछि। जाहि शास्त्रीय परंपराक बलेँ शब्दार्थ ज्ञान केँ बूझि मैथिल बालक लोकनि गौरवान्वित छथि, यशस्वी छथि प्रायः ओकर मौलिक व्युत्पत्तिक अर्थ सँ ओतवे दूर धरि अपरिचित सेहो छथि। दृष्टांत स्वरूप वेद शास्त्रक अध्यापक उपाध्याय कहवैत छलाह। किन्तु आई वेदशास्त्र सँ अपरिचित झा कहवैत छथि। श्रुति स्मृतिक ज्ञाता मिश्र कहवैत छलाह किन्तु आई मिश्र उपाधिधारी श्रुतिस्मृतिक अल्पज्ञानो सँ वंचित छथि। एकर मूल मे अछि मानसिक शिक्षाक प्रधान अंग मनन शक्तिक अभाव।                     एहि प्रकारें महामहोपाध्याय मुकुन्द झा बक्शी मिथिला मे व्याप्त शिक्षाक उत्तरोत्तर ह्रास देखि चिन्ता व्यक्त कएलैन्हि। मैथिल संस्कृतिक रक्षार्थ मिथिला जनपद मे पूर्वक अपेक्षा शिक्षाक प्रति अथवा पूर्व रीतिक परंपरा मे शिक्षाक लेल शारीरिक, मानसिक, नैतिक आ धार्मिक शक्तिक उपयोगक आवश्यकता पर विचार कएलैन्हि। संगहि पूर्वक अपेक्षा मिथिला जनपद केँ, मैथिलीक गौरव केँ एहि ठामक सभ्यता आ संस्कृति केँ विशेष समृद्ध सर्वाशतः उन्नतिक कामना कएलैन्हि। प्रस्तुत गद्य मैथिली साहित्यिक स्तंभ अछि। कारण शैली, भाषा, विचार एवं उपस्थापन रीति केर संगहि प्रौढ़ गद्य, सुनिश्चित विचारधारा एहि मे सर्वत्र परिलक्षित होइछ।