Lecture – By: Dr. Prashant Kr. Manoj

भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’ केँ मैथिली काव्य मे नवीन शैलीक प्रणेता कहल जाइछ। भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’ प्रतिभाशाली साहित्यसेवी ओ युगान्तकारी कवि छलाह। ओ मिथिला आ मैथिलीक अनन्त उपासक छलाह। मैथिली काव्य मे नवीन शैलीक श्रीगणेश हिनके सँ मानल जाइत अछि।                                प्रारंभ मे हिन्दी मे सेहो लिखैत छलाह मुदा बाद मे मातृभाषाक प्रति अनुराग जागि उठल। आ अल्प वयसहि मे बहुत किछु मैथिली साहित्य केँ दए गेलाह। हिनक ‘आषाढ़’ आ ‘स्मृतिकण’ नामक दुई गोट कविता संग्रह अछि। ओ ‘विभूति’ नामक पत्रिकाक सम्पादन सेहो कएलनि। भुवन जी जन्मजात बहुमुखी प्रतिभाक धनी छलाह। निर्भीक समालोचक आ विलक्षण कविक रुप मे मैथिली साहित्याकाश मे आलोकित छथि। मैथिली साहित्य मे नवीनता इएह आनलैन्हि। कविता केँ गीत सँ हटाए आन छन्द मे रचब हिनक नवीनता थिक। स्वार्थ लोलुप शोषक समाजक नृशंसताक चित्रण करब हिनक प्रगतिवाद थिक। हिनक गीत सभ मे नवजागरणक विलक्षण प्रभाव देखल जाइछ। शोषणक प्रति विद्रोहक आह्वान करैत कवि सिंह गर्जना कए उठैत छथि –       ‘हम करब प्रलय हम करब प्रलय       हम रहए देव नहि आब जगत मे        छण भरियो विष कुम्भक मय।”सुखमय ज्वालामय प्रगतिमान, गति रोकि सकै अछि आदिकृपाण।’                           

              कवि क्रांतिक माध्यम सँ युवा वर्गक निर्माण करए चाहैत छथि। ओ अल्प समय मे प्रगतिवादक दीपिका जे साहित्य मध्य बारि गेलाह से चिरकाल धरि आलोक दैत परवर्ती कवि लोकनि केँ मार्ग देखवैत रहत।                       
प्रकृति वर्णनक क्रम मे वसन्त वर्णन मे श्री कविशेखर जीक प्राचीन रीतिक रचना संग हिनक नवीन शैलीक रचनाक तुलना कएला सँ मैथिली काव्य क्षेत्र मे हिनक कृतिक महत्व स्पष्ट भए जाइछ। भुवन जी अपन रचना मे स्वानुभूतिक मधुर सहजता आ सरसताक एक गोट नव आह्लाद दैत अछि। भाषाक प्रति उदार दृष्टिकोण रखनिहार भुवन जी आनो भाषा सँ शब्दक चयन कएलनि। भुवन जी मैथिलीक गौरव छलाह। कविक अकस्मात निधन सँ मैथिलीक कानन विरान भ गेल। मैथिलीक साहित्याकाश सँ प्रगतिवादक अवसान भ गेल। जा धरि मैथिली रहत भुवन जी अपन कृतिक ले अमर रहताह।