M. A. 1st semester Hindi : By- Dr. L.P.K. Sinha

मुबारक बीमारी कहानी की समीक्षा हिंदी के मूर्धन्य साहित्यकार प्रेमचंद, लिखित मुबारक बीमारी कहानी दो पीढ़ियों के बीच होने वाले अहं  के टकराव की कहानी है.            यह हमारे समाज का उद्घाटित सत्य है, की पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी को शक की निगाह से देखा करता है, पुरानी पीढ़ी को अपने तजुर्बे का दंभ रहता है,  वहीं नई पीढ़ी को पुरानी पीढ़ी के ख्यालात बेहद दकियानूसी से प्रतीत होते हैं, और वह इन शिकंजे से अपने आप को आजाद करने की हर मुमकिन कोशिश करता है,  प्रायः ऐसे टकराव,  से परिवारिक रिश्ते में दरार आ जाया करती है, क्योंकि नई पीढ़ी में जहांं,  एक जोश और जज्बा हुआ करता है, वही पुरानी पीढ़ी अपने बनाए ढर्रे पर ही जीवन को गतिशील बनाए रखना ही उचित मानता है, पुरानी पीढ़ी को नए जमाने की चाल ढाल एवं नई टेक्नोलॉजी से एक हद तक नफरत हुआ करती है, वहीं नई पीढ़ी इसका गुणगान करते नहीं,  थकती.     इस कहानी में मुख्यतः तीन पात्र हैं हरनाम दास,  उनका पुत्र हरिदास एवं उसकी पत्नी देवकी हरनाम दास एक आटा चक्की मिल के मालिक है वही उनका पुत्र हरिदास कॉलेज तक की शिक्षा ग्रहण किया हुआ अपने पिता के आटा चक्की में कार्य किया करता है.   हरनाम दास को नई टेक्नोलॉजी से नफरत है तथा वह अपने आटा चक्की मिल को पुरानी मशीन से,  ही संचालित कर रहा है, जिस के रखरखाव में तो खर्च आता ही है, साथ ही साथ मशीन के पुराने पर जाने के कारण उसकी क्षमता भी प्रभावित हो गई है, एक समय में जब आसपास कोई आटा चक्की की मिल नहीं थी, तो हरनाम दास की मिल की तूती बोला,  करती थी किंतु गुजरते समय के साथ उनके मिल के इर्द-गिर्द कई मिले खुल गई, जिसकी मशीनें भी बिल्कुल नई टेक्नोलॉजी के अनुरूप  थी, लिहाजा हरनाम दास के मील में ग्राहकों का आना कम होने लगा तथा मिल से जितनी आय होती उतनी खर्च भी हो जाती, जब -जब उनका पुत्र मिल में कोई सुधार की बात करता हरनाम दास बुरी तरह भड़क जाते तथा उसे अनर्गल बातें तक कह डालते,  जिससे हरिदास अपने पिता से बेहद खफा रहा करता कई दफा उसके मन में यह विचार भी आता की वह अपने पिता केे  मील को छोड़ कोई अन्य जगह नौकरी करें जहां उसे अपनी योग्यता प्रदर्शन का मौका मिल सके, परंतु सुलझे विचारों की उसकी पत्नी देवकी उसे ऐसा करने से रोक देती तथा कहती की उसके ऐसे कदम से पिता को तो दुख होगा ही साथ ही साथ समाज में उसकी बदनामी भी होगी.             

 संयोग से हरनाम दास एक रात खाकर सोए किंतु सवेरे उठने से पहले ही  फाजिल ने उन पर आक्रमण कर दिया जवान बंद हो गई, और  चेहरे पर भी शिकन आ गई उनका पुत्र हरिदास  डॉक्टर को बुला लाया डॉक्टर ने उनकी जांच की तथा पुत्र को सांत्वना देते हुए कहा कि घबराने की कोई जरूरत नहीं है, इनका स्वास्थ्य पूर्व की भांति हो जाएगा परंतु इसमें 3 माह से कम समय नहीं लगेंगे डॉक्टर ने यह भी हिदायत दी कि इन्हें पूरा आराम करने दिया जाए तथा ऐसी कोई बात इनके समक्ष ना की जाए जिससे कि इनकी मानसिक परेशानी में इजाफा हो.         

डॉक्टर द्वारा दी गई दवा से हरनाम दास को जल्दी होश आ गया, होश आते ही उन्होंने इशारे से लिखने के वास्ते कागज़ की मांग कि. और जब कागज व पेंसिल उन तक पहुंचा तो उन्हें बेहद संभलकर  मिल का इंतजाम दीनानाथ के हाथ में रहने देने की ताकीद की,   उनके लिखे शब्द हरिदास को अंदर तक चुभ गया वह सोचा कि इस हाल में आने के बाद भी उन्हें हमसे ज्यादा प्यारा मिल का मैनेजर ही लग रहा है.     

 पापा के लिखे वाक्य के साथ वह अपनी पत्नी के पास आता है, तथा इस बात पर खेद प्रकट करता है, कि उसके पिता उसे अब भी नादान और बेवकूफ समझते हैं, वह अपनी पत्नी से कहता है, कि पिता के बीमार होने का उसे बेहद अफसोस है परंतु अब वह अपनी मनमर्जी से मील का संचालन कर इस मिले समय का सार्थक उपयोग करेगा.       मिल के कर्मियों को जब मालिक के लकवा ग्रस्त होने की सूचना मिली, तो ऐसे कर्मी जो महज चापलूसी के सहारे पगार पा रहे थे, उन्हें घबराहट होने लगी मिल मेंं ऐसे कर्मियों की कोई कमी नहीं थी जो दिन भर यूं ही समय काटा करते थे, और रात होने पर मिल,  चलाया करते थे जिससे कि उन्हें ओवरटाइम का भी भुगतान हो , जाए वही मिल का टेक्नीशियन, कई अन्य मिलो में भी आने वाली गड़बड़ी को दुरुस्त किया करता था और किसी न किसी बहाने मिल को जब उसकी जरूरत रहती थी, वह गायब रहा करता था.     

हरिदास मिल की इस स्थिति से पहले से ही वाकिफ था,  परंतु पिता के कारण कुछ भी करने से लाचार था.    खैर मिल का कार्यभार ग्रहण करने के साथ ही उसने सभी कर्मियों को अपने पास बुला नसीहत दी कि, अब पुरानी परिपाटी इस मिल में नहीं चलेगी, उसने यह स्पष्ट किया कि कार्य के मामले में अब कोई कोताही बर्दाश्तत नहीं की जाएगी तथा कर्मियों  का मूल्यांकन अब कार्य के अनुसार होगा तथा बेहतर कर्मियों को पगार के अतिरिक्त मिल में होने वाले मुनाफे पर कमीशन का भी भुगतान किया जाएगा, वही सुस्त कर्मियों के लिए मिल में कोई जगह नहीं रहेगी बाद में मैनेजर दीनानाथ को बुलाकर  कहा कि मुझे मालूम है कि आप बेहद  तजुर्बेकर एवं कर्मठ व्यक्ति हैं, परंतु यहां जो चल रहा था, उसे ही आपने स्वीकार कर लिया पर अब हालात बदले हैं तथा अब मैं चाहता हूं कि दादा की अनुपस्थिति में मिलके सेहत में बदलाव लाया जाए, इसके लिए मुझे आपके सहयोग की जरूरत है, बाहर से काम लाने का जिम्मा मेरा और अंदर के काम की जवाबदेही आपके माथे रहेगी, मिल को जो भी नफा होगा उसमें आपका भी हिस्सा रहेगा.       

हरिदास के सख्त रवैया एवं कार्य के प्रति जुझारू पन के कारण मिल की हालत दिन-ब-दिन सुधरने लगी मिल को पर्याप्त काम आने लगा दिनानाथ के कर्तव्यय परायणता की वजह से ग्राहकों को तयशुदा समय पर आटा मिलने लगा 1 माह बीतने से पूर्व ही हरिदास ने नई मशीन मंगवा ली, और उसके अनुरूप आदमियों को भी रख लिया, विनम्र हरिदास का ऐसा प्रभाव पड़ा की एक दफा जो मिल में आ जाता वह सर्वदा के लिए मिल का ग्राहक बन जाता, फलतः, आस पास जो भी मिल थे वह चमक-दमक होने लगा, अब मिल का मशीन दिन क्या रात में भी चलने लगा, कार्य की कोई कमी नहीं रही मिल के हाथे में ठेले और गाड़ियों की भीड़ नजर आने लगी, तथा एक समय जिस मिल में सन्नाटा सा पसर गया था  वहां चहल-पहल रहने लगी तीन माह गुजरते गुजरते मील का कायाकल्प हो गया.      दूसरी और बीमार हरनाम दास की हालत दिन-ब-दिन सुधरने लगी एक माह गुजरते गुजरते वे  धीमे स्वर में बोलने भी लगे पर जब उनकी जबान खुली, तो बस एक ही बात का रट लगाए रहते की यह लड़का उन्हें कहीं नहीं छोड़ा सारा कारोबार अपने हाथ में समेट लिया है,  अब मिल को बर्बाद होने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा देवकी उन्हें समझाती परउन्हें अपने बेटे पर पर  जरा भी यकीन नहीं होता देवकी भी बात को नहीं बढ़ाती क्योंकि डॉक्टर की हिदायत  उसे याद थी.     

हरिदास भी जब मिल से लौटता तो उसे वे बुरी तरह फटकार लगाते परंतु वह भी  किसी बहस में ना उलझ कर चुप्पी साध लेता.       देखी उन्हें कहती कि आप उन्हें सारी बातें सही-सही क्यों नहीं बतला देते तो हरिदास कहता की उन्हें मेरी बात पर यकीन होगा ही नहीं,  और ऐसे भी जब तक नहीं आई, मशीन का कीमत अदा नहीं हो जाए, तब तक पूरी बात बताना भी उचित नहीं होगा,  परंतु देवकी द्वारा जोर डालने पर हरिदास कहता है, कि मैं दीनानाथ को उनके पास भेज दूंगा, क्योंकि उन्हें मुझसे ज्यादा विश्वास दीनानाथ पर  ही है, जाहिर तौर पर अगर वह इन्हें समझाएगा तो कुछ ना कुछ विश्वास होगा.         

एक दोपहर दीनानाथ हरनाम दास से मिलने आता है, तथा मिल की अच्छी स्थिति में होने की बात जब उन्हें बताता है, तो उन्हें  विश्वास नहीं होता,  थोड़ी देर रुक कर दिनानाथ जब चला जाता है तो लालाजी खुद जाकर मिल का हाल जानने के लिए कहार से बग्गी मंगाते हैं, और मिल के लिए प्रस्थान कर जाते हैं, जब मिल के हाथे में वे पहुंचते हैं, तो मिल की तस्वीर ही बदली बदली नजर आती है, मिल में ढेर सारे ठेले और गाड़ियां लगी हुई थी दोनों तरफ क्यारियों में फूल लगे हुए थे, जिसमें माली पानी दे रहा था, मिल की मशीनें चल रही थी हरिदास अपने मुहर्रिर को कुछ लिखा रहा था हटात अपने पिता को देख हरिदास फौरन खड़ा हो जाता है, तथा सहारा देकर उन्हें एक आराम कुर्सी पर बिठाता है, वह अपने पिता से कहता है कि अगर आप पूर्व सूचना दे दिए होते तो मैं आपके लिए पालकी भेज देता.     

  कारखाने के कर्मचारियों  को जब हरनाम दास  के आने की सूचना मिली वे सभी भी उनसे मिलने को आए, हरनाम दास की नजर बोरों की छत चूमती ढेरों पर गई, उन्हें अब यह एहसास हुआ की दिनानाथ ने मील की जो वस्तुस्थिति बताई थी, वह बिल्कुल सही थी परंतु  अविश्वास के कारण उन्हें इस बात पर यकीन नहीं हुआ था.    मिल के क्रियाकलापों की जानकारी हरनाम दास लेते हैं, अब उन्हें कोई संदेह नहीं रह गया था अपने पुत्र से कहते हैं, की नाहक ही वे उस पर अविश्वास करते रहे अपने पूर्व के कृत्य पर उन्हें बेहद अफसोस होता है, और पुत्र पर मिथ्या दोषारोपण के लिए उन्हें बेहद तकलीफ भी होती है, उन्होंने कहा कि इस कार्य, से मुझे पूर्व में ही हाथ खींच लेना चाहिए  किंंतु  मैंने ऐसा नहीं किया फलतः,  मिल की हालत दिन-ब-दिन गिरते चली गई और खुद मैं भी बीमार हो गया उन्होंने कहा कि बीमारी तो तकलीफदेह होती है, किंतु मेरी बीमारी सही मायने में मुबारक बीमारी कहीं जाएगी क्योंकि  इसी बीमारी ने जहां तुम्हें अपनी क्षमता प्रदर्शित करने का मौका दिया, वही मुझे तुम्हें परखने का भी मौका मिल गया.     

  वस्तुतः यह कहानी पिता और पुत्र के बीच  के स्नेह को भी प्रदर्शित करता है, यह सच है कि पुत्र कितना भी बड़ा क्योंं ना हो जाए मां पिता की नजर में वह बच्चा ही रहता है, और यह स्थिति कभी कभार अप्रिय स्थिति भी पैदा कर देता है, मां पिता के अतिरिक्त स्नेह के कारण कई दफा बच्चों को अपनी प्रतिभा दिखलाने का मौका ही नहीं मिल पाता इस कारण कई बच्चों की प्रतिभाएं  यूं ही नष्ट हो जाती हैै, यह कहानी ऐसे अभिभावकों को भी नसीहत देती है